CTET Exam Notes : Child Development and Pedagogy (CDP) 

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Topic  : Language & Thought


चिंतन के भेद


सामान्यतः मनोविज्ञान में चिंतन के निम्न रूपों में भेद किया जाता है : संवेदी-क्रियात्मक, बिंबात्मक और अमूर्त ( सैद्धांतिक )।

1.संवेदी-क्रियात्मक चिंतन ( sensory-operational thinking )


मानवजाति के इतिहास के आरंभिक दौर में लोग अपनी समस्या को शुद्ध व्यावहारिक ( practical ) आधार पर हल किया करते थे, सैद्धांतिक ( theoretical ) सक्रियता का जन्म बाद में जाकर हुआ। उदाहरण के लिए, हमारे सुदूर पूर्वजों ने शुरू-शुरू में अपने क़दमों, आदि को गिनकर भूमि को नापना सीखा था और इस व्यावहारिक सक्रियता के दौरान शनैः शनैः जो अनुभव संचित होता गया, वह एक विशेष सैद्धांतिक शाखा के रूप में ज्यामिति ( geometry ) की उत्पत्ति तथा विकास का आधार बना। व्यावहारिक और सैद्धांतिक सक्रियताएं परस्पर-अविभाज्य हैं, किंतु दोनों में पहले व्यावहारिक सक्रियता पैदा हुई और बाद में सैद्धांतिक सक्रियता। व्यावहारिक सक्रियता के विकास के एक अपेक्षाकृत ऊंचे चरण में ही सैद्धांतिक सक्रियता का जन्म हुआ।
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मानवजाति के ऐतिहासिक विकास और हर बच्चे के मानसिक विकास का आरंभ-बिंदु व्यावहारिक सक्रियता है, न कि सैद्धांतिक सक्रियता। बच्चे का चिंतन व्यावहारिक सक्रियता के दायरे में विकसित होता है। शैशवावस्था और आरंभिक बाल्यकाल में ( ३ वर्ष की आयु तक ) बच्चे का चिंतन अधिकांशतः संवेदी-क्रियात्मक रूप का होता है। बच्चा वस्तुओं को अपने हाथों से, व्यावहारिक रूप से उलट-पलट करके, उन्हें जोड़-तोड़ करके, उनके बीच मिलान करके उनका विश्लेषण व संश्लेषण करता है, उनके बारे में अपना ज्ञान बढ़ाता है। जिज्ञासू बच्चे प्रायः अपने खिलौने तोड़ते हैं, क्योंकि वे मालूम करना चाहते हैं कि ‘उनके भीतर क्या है’।


2.बिंबात्मक चिंतन ( imagery thinking ) 


चिंतन के भेद, संवेदी-क्रियात्मक चिंतन ( sensory-operational thinking ), बिंबात्मक चिंतन ( imagery thinking ), अमूर्त चिंतन ( abstract thinking ), CTET Exam Notes Hindi,  बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र, CDP Hindi Notesअपने सरलतम रूप में बिंबात्मक चिंतन मुख्यतः स्कूलपूर्व अवस्था ( ४-७ वर्ष ) की विशेषता है। चिंतन अभी भी व्यावहारिक क्रियाओं से जुड़ा होता है, किंतु यह संबंध अब इतना घनिष्ठ और प्रत्यक्ष नहीं होता। अपनी रुचि की वस्तु के बारे में जानने के लिए बच्चे के वास्ते अब जरूरी नहीं कि वह उसे हाथों से छुए। बहुत सारे मामलों में अब उसके लिए वस्तु का क्रमबद्ध ढ़ंग से प्रहस्तन ( handling ) जरूरी नहीं होता, किंतु उसका प्रत्यक्ष किए बिना, मस्तिष्क में उसका बिंब बनाए बिना उसका काम नहीं चल सकता। दूसरे शब्दों में, स्कूलपूर्व आयु के बच्चे केवल चित्रों और बिंबों के ज़रिए सोच सकते हैं और शब्द के सही अर्थ में संकल्पनाओं ( concepts ) से अपरिचित होते हैं। स्कूलपूर्व आयु के बच्चों में संकल्पनात्मक चिंतन का अभाव निम्न तरह के प्रयोगों से सिद्ध होता है। 

कुछ बच्चों को पेस्ट्री की बनी दो बिल्कुल एक जैसी बड़ी गोलियां दिखाई गईं। उन्होंने गोलियों को ध्यान से देखा और कहा कि वे बराबर-बराबर हैं। इसके बाद उनके सामने ही एक गोली को दबाकर टिकिया की शक्ल दे दी गयी। बच्चों ने ख़ुद देखा कि गोली में और पेस्ट्री नहीं मिलाई गई है और सिर्फ़ उसकी शक्ल बदल दी गई है। फिर भी उनका सोचना था कि टिकिया में पेस्ट्री की मात्रा बढ़ गई है।

बात यह है कि बच्चों का बिंबात्मक चिंतन अभी व्यवहित नहीं होता और पूर्णतः उनके प्रत्यक्ष ( perception )द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वे अभी संकल्पनाओं की मदद से अपने को प्रत्यक्षीकृत वस्तु की कतिपय सर्वाधिक स्पष्ट विशेषताओं से अलग नहीं कर सकते। टिकिया के बारे में सोचते हुए बच्चे देखते हैं कि वह मेज़ पर गोली से ज़्यादा जगह घेरती है। उनका सोचना, जो बुनियादी तौर पर बिंबात्मक है और प्रत्यक्ष से नियंत्रित होता है, उन्हे इस निष्कर्ष पर पहुंचाता है कि टिकिया में गोली से ज़्यादा पेस्ट्री है।

3.अमूर्त चिंतन ( abstract thinking )



अमूर्त चिंतन, यानि अमूर्त अवधारणाओं के ज़रिए चिंतन व्यावहारिक और ऐंद्रीय अनुभव के आधार पर स्कूली आयु के बच्चों में विकसित होता है और आरंभ में इसके रूप सरल होते हैं। स्कूली आयु के बच्चे में चिंतन अपने को व्यावहारिक कार्यों तथा बिंबों ( प्रत्यक्षों तथा परिकल्पनों ) में ही नहीं, अपितु मुख्यतः अमूर्त संकल्पनाओं और तर्कों ( logic ) के रूप में भी व्यक्त करता है।

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स्कूली बच्चों द्वारा गणित, भौतिकी, इतिहास, आदि विभिन्न विषयों का आधारिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत महत्त्व रखती है। विषयों से संबद्ध संकल्पनाओं के निर्माण तथा आत्मसात्करण का अनेक मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों के दौरान अध्ययन किया गया है और पता लगाने का प्रयत्न किया गया है कि संकल्पनाओं के कौन-से लक्षण किस क्रम में और किन परिस्थितियों में छात्रों द्वारा आत्मसात् किये जाते हैं। स्कूली अवस्था की समाप्ति तक बच्चे कमोबेश मात्रा में संकल्पनाओं की एक पद्धति विकसित कर लेते हैं। वे न केवल अलग-अलग अवधारणाओं ( जैसे गुरुत्व, स्तनपायी ) को बल्कि अवधारणाओं के पूरे वर्गों या पद्धतियों ( जैसे ज्यामितीय संकल्पनाओं की पद्धति ) को भी इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।

जैसा कि बताया जा चुका है, इंद्रियजन्य ज्ञान की सीमाओं के बाहर स्थित सर्वाधिक अमूर्त चिंतन भी कभी संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों से नाता पूर्णतः नहीं तोड़ पाता। चिंतन-प्रक्रिया और ऐंद्रीय अनुभव के बीच अटूट संबंध छात्रों की संकल्पना-निर्माण प्रक्रिया में विशेषतः महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

आरंभिक अवस्था में बच्चों को चाक्षुष ( visual ) बिंबों, ठोस ऐंद्रीय सामग्री इस्तेमाल करने में आसानी रहती है। उदाहरण के लिए, बच्चे द्वारा बहुत सारी ऐतिहासिक संकल्पनाओं का आत्मसात्करण बड़ा आसान हो जाता है, यदि उसे इनसे संबंधित चित्र, मॉडल्स, आदि भी दिखाए जाएं और कविताएं व कहानियां भी सुनायी जाएं। दूसरी ओर, हर तरह का चाक्षुषीकरण ( visualization ) और हर तरह की परिस्थिति बच्चों में अमूर्त चिंतन की क्षमता में विकास में सहायक नहीं होती। दृश्य तथा श्रव्य सामग्री की अतिशयता अध्ययनगत विषय के बुनियादी, महत्त्वपूर्ण पहलुओं से बच्चे का ध्यान हटा सकती है और इस तरह उसकी चिंतनात्मक संक्रियाओं ( विश्लेषण तथा सामान्यीकरण ) में बाधा डाल सकती है। इस कारण पढ़ाते समय मूर्त ( concrete ) इंद्रियगम्य और अमूर्त ( abstract ) घटकों में संतुलन बनाए रखे जाना आवश्यक हो जाता है।

किंतु यह सोचना ग़लत होगा कि संकल्पनाओं के आत्मसात्करण के दौरान अमूर्त चिंतन का विकास स्कूली बच्चों के संवेदी-क्रियात्मक और बिंबात्मक चिंतन के विकास को खत्म कर देता या रोक देता है। उल्टे, चिंतन के ये प्राथमिक और आरंभिक रूप पहले जैसे ही जारी रहते हैं और अमूर्त चिंतन के साथ तथा उसके प्रभाव से बदलते तथा सुधरते रहते हैं। चिंतन के सभी भेद और रूप ( बच्चों में भी और बड़ों में भी ) निरंतर विकास करते हैं, हालांकि अलग-अलग श्रेणियों के लोगों में उनके विकास की मात्राएं अलग-अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, तकनीशियनों, इंजीनियरों और डिजायनरों में संवेदी-क्रियात्मक चिंतन अधिक विकसित होता है और साहित्य-कला से जुड़े लोगों में बिंबात्मक ( मूर्त-प्रत्यक्षपरक चिंतन )।

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