CTET 2015 EXAM NOTES


बोली और भाषा

बोली भाषा का वह रूप है जो किसी छोटे से क्षेत्र में, एक छोटे से समूह द्वारा बोली जाती  किसी छोटे  क्षेत्र में स्थानीय व्यवहार से प्रयुक्त होने वाली भाषा का वह अल्पविकसित रूप बोली कहलाती है, यह मात्र बोलचाल तक ही सीमित रहता है इसका कोई लिखित रूप अथवा साहित्य नही होता।
सामान्यतः बोली को हम भाषा की प्राथमिक अवस्था भी कह सकत े है क्योकि भाषा अर्जन की उम्र में बालक सर्वप्रथम अपने क्षेत्र की बोली के सपंर्क में आता है। बाद में शिक्षा के माध्यम के रूप में वह भाषा का उपयोग करता है।

प्रत्येक व्यक्ति की बोलचाल की भाषा अपने आसपास के अन्य व्यक्तियों की भाषा से भिन्न होती है। स्थानीय भाषा होने से इन्हें बोली कहा जाता है। डाॅ. भोलानाथ तिवारी ने बोली को परिभाषित करते हुए कहा है - ‘‘बोली किसी भाषा के एक ऐसे सीमित क्षेत्रीय रूप को कहते है जो ध्वनि, रूप, वाक्य गठन शब्द अर्थसमूह तथा मुहावरे आदि की दृष्टि से उस भाषा के परिनिष्ठित तथा अन्य क्षेत्रीय रूप से भिन्न होता है, किन्तु इतना भिन्न भी नहीं कि अन्य रूपों में बोलने वाले उसे समझ न सकें, साथ ही जिसके अपने क्षेत्र में कहीं भी बोलने वालों के उच्चारण रूप, रचना, वाक्य गठन, अर्थ, शब्द समूह तथा मुहावरों आदि में बहुत स्पष्ट भिन्नता नही होती है।  ’ ये बोलियाँ अपने स्थानीय क्षेत्र के नाम से भी जानी जाती है जसै  -बुंदेलखंड क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली बुंदेली कहलाती हैं उसी प्रकार अवध की अवधी मालवा की मालवी बोली आदि। इनमें कही बनावटीपन नहीं है तथा स्थानीय गंध सहज ही मिल जाती है।

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