CTET 2015 EXAM NOTES

निदानात्मक मूल्यांकन एवं उपचारात्मक शिक्षण

मूल्यांकन के प्रकार
मूल्यांकन के निम्न प्रकार होते है -
1 निदानात्मक मूल्यांकन एवं

2 उपचारात्मक शिक्षण ।

निदानात्मक परीक्षण की आवश्यकता

विद्यालयों में निष्पत्ति परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। जिनसे यह ज्ञान होता है कि छात्रों ने कितना सीखा है। छात्रों के साफल्य के आधार पर उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण घोषित किया जाता है, श्रेणियों का आवंटन किया जाता है। छात्रों का वर्गीकरण किया जाता है अगली कक्षा में प्रोन्नति की जाती है। परंतु जिन छात्रों को सफलता नहीं मिल सकीं उसका क्या कारण है ? इसका बोध निष्पत्ति परीक्षण से नहीं होता इसके लिए निदानात्मक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। शिक्षा परीक्षण की दृष्टि से निष्पत्ति एवं निदानात्मक परीक्षाएॅ एक दूसरे की पूरक होती है। विरोधी नहीं। शैक्षिक मापने के अंतर्गत दोनों प्रकार के परीक्षाओं को सम्मिलित किया जाता है।

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निदान के कार्य

3 निदान संबंधी कारण- यह कार्य सबसे जटिल और कठिन होता है। इसके अंतर्गत यह ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है कि उसके सीखने की कमजोरियाँ उसके सामान्य योग्यताओं एवं विशिष्ट योग्यताओं से किस प्रकार संबंधित है। इसके अंतर्गत छात्रों के न सीखने के कारणों का पता लगाया जाता है।

निदान की विधियाँ

निदान की प्रक्रिया में प्रमुख रूप से दो प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है - 

 


उपचारी शिक्षण

उपचारी शिक्षण के भी उनके रूप हो सकते है- बालकों की कठिनाईयों का सामूहिक रूप से निवारण और उचित अभ्यास, वैयक्तिक भेदों के आधार पर वयक्तिगत बालक की अशुध्दियों का निवारण, उपचार गृहों अथवा भाषा-प्रयोगशालाओं में बालकों के उच्चारण एवं भाषा संबंधी प्रशिक्षण और अभ्यास।


इसके अतिरिक्त सस्वर वाचन संबंधी उपचारी शिक्षण में निम्नांकित बातों का भी ध्यान रखना होगा-
 1   दोषपूर्ण सस्वर वाचन करने वाले छात्रों की योग्यता को ध्यान में रखते हुए उनके अनुकूल विषय-सामग्री द्वारा उनका शिक्षण प्रारम्भ करना चाहिए, भले ही कुछ समय के लिए कक्षा स्तर से नीचे उतरना पडे़। पठन सामग्री उनके अनुकूल सरल और रोचक होनी चाहिए जिससे धीरे-धीरे पठन में उसकी रूचि बढ़े, गति बढे़ और अर्थ ग्रहण की शक्ति भी बढ़े। वाचन को सोद्देश्य बनाकर ऐसे बालकों में पढ़ने के प्रति प्रेरणा उत्पन्न करनी चाहिए।
 

‘शैक्षणिक निदान एवं उपचारी शिक्षण‘ का महत्व

आधुनिक शिक्षण में ‘शैक्षणिक निदान एवं उपचारी शिक्षण‘ एक नवीन प्रयोग है और इससे उन बालकों को विशेष लाभ है जो किन्ही कारणों से सीखने की क्रिया में पिछड़ जाते हैं और अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाते।

‘शैक्षणिक निदान एवं उपचारी शिक्षण‘ की उपयोगिताएँ संक्षेप में निम्नांकित हैं-
 
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