CTET 2015 EXAM NOTES IN HINDI MEDIUM


प्रोजेक्ट विधि - अर्थ एवं स्वरूप  

जिस विधि से छात्रा किसी भी शैक्षणिक समस्या का हल स्वाभाविक परिस्थिति में खोजने का प्रयास करता है, तर्क द्वारा जानकारी प्राप्त करता है और उस ज्ञान के आधार पर अपने व्यवहार में परिवर्तन कर समस्याका समाधान करता है, उसे प्रोजेक्ट पद्धति कहते है। इस विधि में समस्या का हल खोजने के लिये प्रयोजन पूर्ण कार्य किये जाते है।


यह विधि जाॅन डीवी की विचारधारा पर आधारित है। इसको विकसित करने का श्रेय किलपैट्रिक को जाता है।’’ उसके अनुसारप्रयोजन एक उद्देश्यपूर्ण कार्य है जिसे सामाजिक वातावरण में पूर्ण तन्मयता के साथ सम्पन्न किया जाता है। बेलार्ड ने प्रोजेक्ट को यथार्थ जीवन का एक अंश बताया जिसे स्कूल में आयात कर लिया जाता है।

स्टीवेन्सन ने कहा ‘‘योजना एक समस्यामूलक कार्य हैं, जिसे प्राकृतिक स्थिति में पूरा किया जाता है।’’ 
इसमें अनुभव की पूर्ति के लिए भौतिक साधनों तथा वस्तुओं का प्रयोग आवश्यक हैं। इसमें जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का वास्तविक रुप में चयन करते है। समस्याओं के लिये योजना तैयार की जाती है। छात्रा अपनी समस्या के हल ढूँढ़ने के लिये जो क्रियाएं करता है, उन क्रियाओं को भली प्रकार पूरा करने के लिये अनेक सूचनायें एकत्रित करता है। छात्रा को विषय ज्ञान-अनुभवों एवं क्रियाओं द्वारा प्राप्त होता है। अध्यापक का स्थान गौण होता है। उसका कार्य निर्देशन देना होता है।

प्रोजेक्ट विधि के बुनियादी सिद्धान्त

यह विधि निम्नलिखित बुनियादी सिद्धान्तों पर आधारित हैं:-

प्रोजेक्ट पद्धति के क्रियात्मक सोपान

इस पद्धति में किसी उद्देश्यपूर्ण क्रिया द्वारा विद्यार्थियों को उपयोगी शिक्षा प्रदान की जाती है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब योजना का चुनाव एवं क्रियान्वन उचित रुप से किया जाये। इसके लिये एक निश्चित प्रक्रिया अपनानी होती है जिसके मुख्य सोपान निम्नलिखित हैं:-


4.  योजना का क्रियान्वन :
योजना बन जाने के पश्चात उस का क्रियान्वन आरम्भ होता है। एक योजना में कई क्रियाये सम्मिलित होती है। वे क्रियायें विद्यार्थियों में उनकी रुचियों तथा योग्यताओं के अनुसार बंट जानी चाहिए। यद्यपि यह कार्य भी मुख्यतः विद्यार्थियों द्वारा करना होता है। परन्तु इसमें भी अध्यापक का सर्तक मार्गदर्शन आवश्यक है। उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सभी विद्यार्थी इसमें कुछ कुछ काम अवश्य करे जो उनकी रुचि के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त अध्यापक को आवश्यक सूचनायें भी प्रदान करनी चाहिए। विद्यार्थियों को वांछित सूचना प्राप्त करने के स्त्रोत भी बताने चाहिए। यह सभी कार्य अध्यापक को मार्गदर्शक और सहायक के रुप में करने चाहिएं। मुख्य भूमिका स्वयं विद्यार्थियों को निभानी होती है।

5.  मूल्यांकन :
योजना पूर्ति के पश्चात उसका मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थियों को यह जानकारी प्राप्त होगी कि उन्होंने योजना के अनुसार कार्य किया या नही, कार्य के क्रियान्वन में कौन सी त्राुटियाँ रह गई और कौन सी अच्छी बातें सामने आई; क्या उपलब्धियां हुई; वांछित लक्ष्य की प्राप्ति हुई या नहीं आदि। मूल्यांकन भी स्वयं विद्यार्थियों द्वारा किया जाना चाहिए अर्थात् उन्हें स्वयं अपने कार्य की आलोचना करनी चाहिए। इसमें अध्यापक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।

6.  रिकार्ड करना :
योजना से प्राप्त उपलब्धियों को स्थाई बनाने, योजना में आने वाली कठिनाइयों के प्रति भविष्य में सावधान करने तथा योजना के कार्यान्वन के दौरान गलतियों से भविष्य में सचेत रहने के लिये योजना के चयन से लेकर उसके मूल्यांकन तक पूर्ण विवरण लिख लेना चाहिए। इसके लिये प्रत्येक विद्यार्थी को एक योजना विवरण लिखने के लिये कहा जाना चाहिए।

प्रोजेक्ट पद्धति के लाभ

8.  छात्रा शिक्षक का आपसी सम्बन्ध ;:
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9.  स्व मूल्यांकन में सहायक ;:
यह विधि छात्रा को स्व मूल्यांकन करवाने मंे सहायक होती है। इससे जहां उन्हें अपनी उपलब्धियों से सन्तुष्टि होती हैं वही अपनी त्राुटियों को जानकर उनमें सुधार करता है। स्व मूल्यांकन की यह प्रवृति उसके भावी जीवन के कास मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
10.  ज्ञान प्राप्ति का स्त्रोत :
योजना विधि मंे कई बार कार्य करते करते आकस्मिक ज्ञान भी प्राप्त होता रहता है। इस प्रकार का ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा अधिक स्थाई होता हैं।

प्रोजेक्ट पद्धति की सीमाएं


इस विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस विधि का प्रयोग यदि अन्य विधियों की पूरक विधि के रुप में किया जाए तो इसके द्वारा प्रत्यक्ष शिक्षण, क्रमबद्ध अध्ययन, प्रदर्शन और अनुभव तथा चर्चा द्वारा पाठ्यक्रम सामग्री के विकास के अवसर मिलते है। इस विधि को इस विषय की शिक्षा की एक मात्रा विधि नहीं माना जा सकता है।
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