CTET 2015 EXAM NOTES

शिक्षण प्रक्रिया में पाठ्य-पुस्तक प्रयोग 

भूमिका: अर्वाचीन शिक्षा पाठ्य-पुस्तकों पर आधारित है। प्राचीन काल में जब मुद्रणकाल का विकास नहीं हुआ था, तब समस्त विषयों की शिक्षा मौखिक रूप से हुआ करती थी। आधुनिक युग ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी के अत्याधिक विकास के कारण मौखिक शिक्षा देना असम्भव ही नहीं, दुष्कर कार्य है यदि यह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी कि भाषा की पुस्तकें तो साधन साध्य दोनों रूपों में प्रयोग की जाती है। बच्चों को उनके उच्चारण को शु  करने, पठन कला में निपुण करने, उनकी बोध एवं कल्पना शक्ति का विकास करने, उनकी रचनात्मक वृत्ति को सचेष्ट करने और उन्हें विविध विषयों का ज्ञान करा कर उनका चरित्र निर्माण करने के हेतु प्रयोग करते है।

पाठ्य-पुस्तक क्या है

प्राचील काल में भारत पाठ्य-पुस्तक के लिए ग्रन्थ शब्द का प्रचलन था। ग्रन्थ का शाब्दिक अर्थ है- ‘गूँथना’, ‘बाँधना’, क्रम से रखना आदि। गुरूकुलों में आचार्य लोग ‘ताड़पत्रा’ या ‘भोजपत्रा’ को अपने शिष्यों के समक्ष क्रम से रखते थे। उनमें बीच में छेद करके किसी धागे से गूँथ भी देते थे। इसीलिए इन्हें ‘ग्रन्थ’ कहा जाता था।
अंग्रेजी के श्ठववाश् शब्द की व्युत्पत्ति जर्मन भाषा की ‘वीक’ 'Beach' शब्द से हुई है। जिसका अर्थ है- वृक्ष। फ्राँसीसी भाषा में इसका सम्बन्ध वृक्ष की छाल या तख्ती पर लिखने से है।

 पाठ्य-पुस्तक की परिभाषा

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क्रानबैक के विचारानुसार- पाठ्यपुस्तक प्रायः अप्रौढ़ छात्रों के लिए लिखी जाती है।

 पाठ्य-पुस्तकों के उद्देश्य


 पाठ्य-पुस्तकों की आवश्यकता (उपयोगिता)


पाठ्य-पुस्तकों के गुण या विशेषताएं

पाठ्य-पुस्तकों को हम मुख्यतः दो विशेषताओं के आधार पर विभाजित करते हैं।
1  आन्तरिक विशेषताएं
2  बाह्य विशेषताएं
1  आन्तरिक विशेषताओं को हम तीन भागों में विभाजित करते हैं।
  •  सामान्य विशेषताएं
  • भाषा सम्बन्धी विशेषताएं
  •  शैली सम्बन्धी विशेषताएं

 सामान्य विशेषतायेंः


भाषा सम्बन्धी विशेषताएं


शैली सम्बन्धी विशेषताएँः- अग्रलिखित है-

1  भिन्नताः पुस्तकों की शैली में विभिन्नता का होना आवश्यक है। इससे पदों मंे नवीनता एवं रूचि बनी रहती है, इस का यह लाभ है कि छात्रा विभिन्न शैलियों की सम्यक् जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।
2  प्रभावोत्पादकताः पुस्तकों में ऐसे अध्यायों का चयन होना चाहिए, जिनकी शैली आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक हो।
3  स्तरानुकूलः पुस्तक की शैली कक्षा और बालकों के स्तरानुकूल होनी चाहिए। छोटी कक्षाओं की शैली विवरणात्मक, संवादात्मक, कथात्मक हो, एवं उच्च कक्षाओं की शैली भावात्मक एवं तर्क प्रधान हो।

बाह्य विशेषताएं


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