भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम (1857-1947) - 2 

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भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस (आई एन सी) का गठन

भारतीय राष्‍ट्रीय आंदोलन की नींव, सुरेन्‍द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 में कलकत्‍ता में भारत एसोसिएशन के गठन के साथ रखी गई। एसोसिएशन का उद्देश्‍य शिक्षित मध्‍यम वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करना, भारतीय समाज को संगठित कार्यवाही के लिए प्रेरित करना था। एक प्रकार से भारतीय एसोसिएशन, भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस, जिसकी स्‍थापना सेवा निवृत्‍त ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ.ह्यूम की सहायता की गई थी, की पूर्वगामी थी।
1895 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस (आई एन सी) के जन्‍म से नव शिक्षित मध्‍यम वर्ग के राजनीति में आने के लक्ष्‍ण दिखाई देने लगे तथा इससे भारतीय राजनीति का स्‍वरूप ही बदल गया। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन दिसम्‍बर 1885 में बम्‍बई में वोमेश चन्‍द्र बनर्जी की अध्‍यक्षता में हुआ तथा इसमें अन्‍यों के साथ-साथ भाग लिया।

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सदी के बदलने के समय, बाल गंगाधर तिलक और अरविंद घोष जैसे नेताओं द्वारा चलाए गए "स्‍वदेशी आंदोलन" के मार्फत् स्‍वतंत्रता आंदोलन सामान्‍य अशिक्षित लोगों तक पहंचा। 1906 में कलकत्‍ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन जिसकी अध्‍यक्षता दादा भाई नौरोजी ने की थी, ने "स्‍वराज्‍य" प्राप्‍त करने का नारा दिया अर्थात् एक प्रकार का ऐसा स्‍वशासन जा ब्रिटिश नियंत्रण में चुने हुए व्‍यक्तियों द्वारा चलाया जाने वाला शासन हो, जैसा कनाडा व आस्‍ट्रेलिया में, जो ब्रिटिश साम्राज्‍य के अधीन थे, में प्रचलित था।

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बीच, 1909 में ब्रिटिश सरकार ने, भारत सरकार के ढांचे में कुछ सुधार लाने की घोषणा की, जिसे मोरले-मिन्‍टो सुधारों के नाम से जाना जाता है। परन्‍तु इन सुधारों से निराशा ही प्राप्‍त हुई क्‍योंकि इसमें प्रतिनिधि सरकार की स्‍थापना की दिशा में बढ़ने का कोई प्रयास दिखाई नहीं दिया। मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्‍व दिए जाने के प्रावधान को हिंदु-मुसलमान एकता जिस पर राष्‍ट्रीय आंदोलन टिका हुआ था, के लिए खतरे के रूप में देखा गया अत: मुसलमानों के नेता मोहम्‍मद अली जिन्‍ना समेत सभी नेताओं द्वारा इन सुधारों का ज़ोरदार विरोध किया गया। इसके बाद सम्राट जार्ज पंचम ने दिल्‍ली में दो घोषणाएं की, प्रथम बंगाल विभाजन जो 1905 में किया गया था को निरस्‍त किया गया, द्वितीय, यह घोषणा की गई कि भारत की राजधानी कलकत्‍ता से हटाकर दिल्‍ली लाई जाएगी।

वर्ष 1909 में घोषित सुधारों से असंतुष्ट होकर स्वराज आन्दोलन के संघर्ष को और तेज कर दिया गया। जहां एक ओर बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चन्द्र पाल जैसे महान नेताओं ने ब्रिटिश राज के खिलाफ एक तरह से लगभग युद्ध ही शुरू कर दिया तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों ने हिंसात्मक गतिविधियां शुरू कर दीं। पूरे देश में ही एक प्रकार की अस्थिरता की लहर चल पड़ी। लोगों के बीच पहले से ही असंतोष था, इसे और बढ़ाते हुए 1919 में रॉलेट एक्ट अधिनियम पारित किया गया, जिससे सरकार ट्रायल के बिना लोगों को जेल में रख सकती थी। इससे लोगों में स्वदेश की भावना फैली और बड़े-बड़े प्रदर्शन तथा धरने दिए जाने लगे, जिन्हें सरकार ने जलियांवाला बाग नर संहार जैसी अत्याचारी गतिविधियों से दमित करने का प्रयास किया, जहां हजारों बेगुनाह शांति प्रिय व्यक्तियों को जनरल डायर के आदेश पर गोलियों से भून दिया गया। 

जलियांवाला बाग नरसंहार

दिनांक 13 अप्रेल 1919 को जलियांवाला बाग में हुआ नरसंहार भारत में ब्रिटिश शासन का एक अति घृणित अमानवीय कार्य था। पंजाब के लोग बैसाखी के शुभ दिन जलियांवाला बाग, जो स्‍वर्ण मंदिर के पास है, ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अपना शांतिपूर्ण विरोध प्र‍दर्शित करने के लिए एकत्रित हुए। अचानक जनरल डायर अपने सशस्‍त्र पुलिस बल के साथ आया और निर्दोष निहत्‍थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई, तथा महिलाओं और बच्‍चों समेंत सैंकड़ों लोगों को मार दिया। इस बर्बर कार्य का बदला लेने के लिए बाद में ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग के कसाई जनरल डायर को मार डाला।

प्रथम विश्‍व युद्ध (1914-1918) के बाद मोहनदास करमचन्‍द गांधी कांग्रेस के निर्विवाद नेता बने। इस संघर्ष के दौरान महात्‍मा गांधी ने अहिंसात्‍मक आंदोलन की नई तरकीब विकसित की, जिसे उसने "सत्‍याग्रह" कहा, जिसका ढीला-ढाला अनुवाद "नैतिक शासन" है। गांधी जो स्‍वयं एक श्रद्धावान हिंदु थे, सहिष्‍णुता, सभी धर्मों में भाई में भाईचारा, अहिंसा व सादा जीवन अपनाने के समर्थक थे। इसके साथ, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्‍द्र बोस जैसे नए नेता भी सामने आए व राष्‍ट्रीय आंदोलन के लिए संपूर्ण स्‍वतंत्रता का लक्ष्‍य अपनाने की वकालत की।

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