स्वतंत्रोत्तर काल:

स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत में स्थापत्य कला की दो शैलियां उभर कर सामने आईं- पुनरुत्थानवादी व आधुनिकतावादी। पुनरुत्थानवादियों ने मुख्य रूप से अंग्रेजी शैली को ही अपनाया जिसकी वजह से वे स्वतंत्र भारत में अपनी कोई छाप नहीं छोड़ सके। आधुनिकवादियों ने भी किसी नई शैली का विकास करने की बजाय अंगे्रजी व अमेरिकी मॉडलों को ही अपनाने पर जोर दिया। इन दोनों मॉडलों ने ही भारत में विविधता और जरूरतों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।

लि कॉर्बुसियर द्वारा डिजाइन किये गये चंडीगढ शहर को स्वतंत्र भारत में भारतीय स्थापत्य का सबसे सफल नमूना माना जा सकता है।

हाल के दिनों पश्चिमी देशों में भी आधुुनिकतावाद का मर्सिया पढ़ा जा चुका है जिसकी वजह से अब भारतीय स्थापत्यकार भी भारतीय जड़ों को तलाश कर रहे हैं। हालांकि इस क्षेत्र में आज भी भ्रम की स्थिति है।


भारतीय स्थापत्य कला की मुख्य शैलियाँ


नागर शैली: नागर शैली में मंदिरों का निर्माण चौकोर या वर्गाकार रूप में किया जाता था। प्रमुख रूप से उत्तर भारत में इस शैली के मंदिर पाये जाते हैं। इसी के साथ-साथ एक ओर बंगाल और उड़ीसा, दूसरी ओर गुजरात और महाराष्ट्र तक इस शैली के उदाहरण मिलते हैं।

द्रविड़ शैली: द्रविड़ शैली के मंदिर कृष्णा नदी से लेकर कन्या कुमारी तक पाये जाते हैं। इसमें गर्भगृह के ऊपर का भाग सीधा पिरामिडनुमा होता है। उनमें अनेक मंजिले पाई जाती हैं। आंगन के मुख्य द्वार को गोपुरम कहते हैं। यह इतना ऊँचा होता है कि कई बार यह प्रधान मंदिर के शिखर तक को छिपा देता है। द्रविड़ शैली के मंदिर कभी-कभी इतने विशाल होते हैं कि वे एक छोटे शहर लगने लगते हैं।

बेसर शैली: नागर और द्रविड़ शैलियों के मिले-जुले रूप को बेसर शैली कहते हैं। इस शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा तक पाये जाते हैं। बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं। चालुक्य तथा होयसल कालीन मंदिरों की दीवारों, छतों तथा इसके स्तंभों द्वारों आदि का अलंकरण बड़ा सजीव तथा मोहक है। 

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