समूह गतिशास्त्र किसे कहते हैं?

समूह गतिकि सम्प्रत्यय का प्रतिपादन कुर्ट लेविन ने 1945 में किया। लेविन के अनुसार समूह गतिकि से तात्पर्य समूह के विशेषकर छोटे समूह के उन बलों एवं प्रभावों से होता हैं जिनसे सदस्यों का व्यवहार एक निश्चित दिशा में परिवर्तित होता हैं। समूह गतिकि का तात्पर्य समूह के भीतर के उन बलों एवं दबावो से होता हैं जो सदस्यों के व्यवहारों को इस सीमा तक प्रभावित करते हैं कि उनमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आ जाते हैं । समूह में प्रत्येक सदस्य का एक अपना विशिष्ट स्थान होता हैं। प्रत्येक सदस्य अपने इस विशिष्ट पद या स्थान के अनुसार व्यवहार करता हैं।
प्रत्येक सदस्य का व्यवहार अन्य सदस्यों द्वारा किये गये व्यवहारों द्वारा प्रभावित होता हैं। समूह में समरसता तथा विद्यटनकारी दोनो तरह के बल कार्य करते हैं। इन दोनो तरह के बलों से सदस्यों का व्यवहार प्रभावित होता हैं तथा समूह में परिवर्तन आता हैं। जब सदस्यों में समरसता रहती हैं। ऐसी स्थिति में सदस्यों की अधिकतम आवश्यकताओं की पूर्ति होती हैं। जब सदस्यों के लक्ष्य तथा समूह के लक्ष्य में संघर्ष होता हैं या सदस्यों के बीच उचित संचार मंे बाधा होने से उनके बीच दीवार खड़ी हो जाती हैं तो समूह में विद्यटनकारी बल अधिक सक्रिय माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में समूह का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता हैं।

अंग्रेजी का शब्द Dynamics'जिसका अर्थ हैं गति, यह ग्रीक भाषा के शब्द से निकला हैं जिसका अर्थ हैं। शक्ति। समूह गतिशीलता उन शक्तियों का ज्ञान देता हैं जो एक समूह में सक्रिय होती हैं उन शक्तियों का अध्ययन समूह गतिशीलता का अन्वेषण का विषय होता हैं। यह अन्वेषण दिशा में होते हैं जिससे यह पता चल जाए कि शक्तियां किस प्रकार उभरती है? किन परिस्थितियों में ये शक्तियां सक्रिय होती हैं? क्या इनकंे परिणाम होते हैं ? और किस प्रकार से उनका रूपान्तर किया जा सकता हैं ? समूह विज्ञान की जानकारी किस उद्देश्य के लिए उपयोग करना ?
मनोवैज्ञानिक क्रेच एवं क्रेचफील्ड के अनुसार ‘‘समूह गतिशीलता का अर्थ हैं समूहो के अन्तर्गत होने वाले परिवर्तन‘‘
प्रो0 ट्रो. ने समूह गतिशीलता को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ‘‘समूह गतिशीलता एक वैज्ञानिक अध्ययन हैं जो विभिन्न समूह सम्बन्धों में व्यक्ति के व्यवहार और विभिन्न आन्तरिक एवं बाह्य परिस्थितियों के अन्तर्गत समूह प्रक्रियाओं का कभी-कभी उनकी प्रभावकारिता को बढ़ाने ंके विचार से अध्ययन करता हैं।,

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समूह गति-विज्ञान समूह व्यवहार को परिचालित करने वाली शक्तियों का वैज्ञानिक अध्ययन हैं।

समूह गतिशीलता की विशेषताएं -

1. समूह गतिशीलता के कारण समूह का प्रभाव क्षेत्र बनता हैं और इसे बढ़ाया जा सकता हैं।
2. सामाजिक अन्तः प्रक्रिया के सकारात्मक आधार हैं - सहयोग, प्रतिस्पर्धा, व्यवस्था एवं परिपाक इसमे समूह का विकास होता हैं। इनके परिवर्तन संघर्ष सामाजिक अन्तः प्रक्रिया का नकारात्मक आधार जिसके कारण समूह का विघटन हो सकता हैं।
3. व्यक्ति की तरह समूह का भी एक व्यवहार हैं जो परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील होता हैं।
4. समूह गतिशीलता वैज्ञानिक ढंग से यह जानने का प्रयास करता है कि समूह की विभिन्न आन्तरिक एवं बाह्य दशाओं में व्यक्ति का व्यवहार और सामूहिक प्रक्रियाएं किस प्रकार होती हैं।

समूह व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्व:-

प्रत्येक समूह का एक समूह व्यवहार होता हैं और यह समूह व्यवहार आन्तरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के कारण परिवर्तित होता रहता हैं। यह परिवर्तन समूह को विकास की दिशा में भी ले जा सकता हैं और विनाश की ओर भी प्रवृत्त कर सकता हैं। समूह की दिशा प्रगति की ओर होने पर इसमें दृढ़ता आती हैं और समूह के प्रत्येक घटक की आवश्यकताओं की पूर्ति होती हैं। व्यक्ति के साथ-साथ समूह भी विकसित होता हैं। इसके विपरीत यदि समूह की दिशा गति की ओर होती हैं तो समूह की दृढ़ता में कमी आती हैं व्यक्ति समूह को अपने अनुसार मोड़ने का प्रयास करते हैं और अन्त में समूह बिखर जाता हैं अतः ऐसे तत्वों का अध्ययन करना आवश्यक हैं जिनके कारण समूह एवं उनके सदस्य प्रगति की ओर बढ़ते हैं ये तत्व हैं:-

1. प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया-यदि समूह के लक्ष्यों के निर्धारण में समूह के क्रिया-कलापों के समायोजन में ओर आपसी अन्तः सम्बन्धों को बढ़ाने में प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया अपनायी जाती हैं तो सदस्यों की भागीदारी बढ़ती हैं उन्हें सन्तुष्टि मिलती हैं और उसे समूह की दृढ़ता उत्तरोत्तर बढ़ती हैं।

2. व्यक्तिगत एंव समूह लक्ष्य - प्रत्येक समूह के अपने लक्ष्य होते हैं। व्यक्ति किसी समूह से तभी जुड़ता हैं जब उसके व्यक्तिगत लक्ष्यों की पूर्ति उस समूह में रहते हुए हो सकती हैं जब भी व्यक्ति को लगता हैं कि उसके व्यक्तिगत लक्ष्यों की पूति समूह में रहने में नहीं हो पा रही हैं तो वह समूह को त्याग देता हैं। यदि समूह के लक्ष्यों को सदस्यों की इच्छाओं के अनुरूप समय-समय पर संशोधित किया जाता रहता हैं तो सदस्यगणों को आकर्षण समूह के प्रति बना रहता हैं और समूह दृढ़तर होता जाता हैं।

3. प्रतिस्पर्धा- समूह के व्यक्तियों के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धाओं के आयोजन से उनका समूह के प्रति आर्कषण बढ़ता हैं। जब ये प्रतिस्पर्धाएं खेल भावना को बढ़ाने में प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया अपनायी जाती हैं तो सदस्यों की भागीदारी बढ़ती हैं, उन्हें सन्तुष्टि मिलती है और उससे समूह की दृढ़ता उत्तरोतर बढ़ती हैं।

 कक्षा एक समूह के रूप में 

कक्षा एक समूह के रूप मे कार्य करता हैं। कक्षा एक अनुदेशनात्मक समूह के रूप में अपनी सदस्यों की आवश्यकतओं की पूर्ति एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करता हैं। कक्षा की संरचना विभिन्न विषयों के मध्य स्थायी सम्बन्धों के प्रतिमान को इंगित करती हैं प्रत्येक कक्षा की अपनी अलग संरचना होती हैं। कक्षा की संरचना विभिन्न शक्तियों से मिलकर बनता है। संस्था की वैधानिक आवश्यकता भी एक शक्ति हैं। संस्था के द्वारा नियम पालन व अध्यापकों और विद्यार्थियों को नियमों की अनुपालना की बाध्यता कक्षा के संगठन को निर्धारित करती हैं। पब्लिक स्कूलों की वित्तीय व्यवस्था उसके कक्षा समूहों की संरचना का निर्धारण करती हैं। 

विद्यालय द्वारा प्रतिबन्धित विद्यालयी सभा व निर्वाचित कमेटीया भी कक्षा समूह के संगठन को प्रभावित करेगी। समुदाय के रीति-रिवाज व सांस्कृतिक कारक भी कक्षा संरचना को प्रभावित करते हैं। समुदाय मे अधिनायकवादी संरचना से प्रेरणा पाकर कक्षाओं में भी अधिनायकवादी संगठन देखने को मिलता हैं। विद्यालयी समुदाय के विद्यार्थी, अध्यापक, प्रधानाध्यापक व अन्य कर्मचारी विद्यालयी समुदाय की आवश्यकताएं भी महत्त्वपूर्ण हैं। कक्षा समूह में विद्यार्थियों की आवश्यकताएं निश्चित रूप से उसके संगठन को प्रभावित करेगी। विद्यार्थियों की आवश्यकताएं मुख्य रूप से वृद्धि एवं विकास, सामाजिक विकास, मित्रता व अधिगम से सम्बन्धित हैं। अन्य व्यक्तियों (कर्मचारी, अध्यापक, प्रधानाध्यापक) की आवश्यकताएं भी कक्षा संगठन को प्रभावित करती हैं।

कक्षा की संरचना को उसके विभिन्न आयामों को जानकर समझा जा सकता हैं। संगठनात्मक आयाम को विभिन्न दृष्टिकोणों से जाना जा सकता हैं। फलैन्डरस ने तीन आयाम - सत्ता, लक्ष्योन्मुखता व सामाजिक पहुँच उपलब्धता का सुझाव दिया हैं।

किसी भी समूह के द्वारा निर्धारित किया कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक हैं। कार्य संरचना को फलैन्डर्स ने लक्ष्योन्मुखता कहा है को सम्मिलित किया जा सकता है। यदि कक्षा के विद्यार्थी प्रदत्त कार्य को महत्वपूर्ण मानते हैं तो वे अपनी सारी उर्जा उसे पूर्ण करने में लगा देते हैं। इससे कक्षा का संगठन निर्धारित होता हैं।

द्वितीय आयाम सत्ता संरचना हैं। कक्षाओं में सत्ता प्रतिमान अलग-अलग पाये जाते हैं कक्षा में प्रायः सत्ता का केन्द्रीयकरण अध्यापक में होता हैं। परन्तु कई बार विद्यार्थियों में सत्ता का विभाजन विभिन्न प्रकार से किया जाता हैं यह विद्यार्थियो को दिये गये दायित्वों पर निर्भर करता हैं।

तृतीय आयाम सम्प्रेक्षण संरचना हैं जो सत्ता की तरह ही महत्त्वपूर्ण हैं सम्प्रेक्षण की प्रक्रिया एक तरफा हो सकती हैं, जब अध्यापक विद्यार्थियों से अधिकांश समय तक बातचीत करता हैं व विद्यार्थी निष्क्रिय बने रहते हो ऐसा सम्प्रेषण एक तरफा होता हैं जब विद्यार्थियो की सम्प्रेक्षण प्रक्रिया में सहभागिता होती हैं तो इसे प्रवाह चक्र सम्प्रेषण कहा जाता हैं। सम्प्रेषण संरचना सामाजिक पहुंच को प्रभावित करती हैं।

जे.एन. मोरेनो ने कक्षा में सम्बन्धों का अध्ययन करने के पश्चात् सदस्यों के मध्य निम्न प्रतिमान पाए-
(1) अत्यन्त लोकप्रिय -ये बालक कक्षा में अधिकांश बालकों के द्वारा पसन्द किये जाते हैं।
(2) एकान्त में रहने वाले - इन बालकों को कक्षा में कोई भी पसन्द नहीं करता।
(3) जोड़े -ऐसे बालक एक दूसरे को पसदं करते हैं।
(4) श्रंखला -कक्षा में ऐसी श्रंखलाएं पायी जाती हैं। जिससे एक बालक दूसरे बालक को व दूसरा बालक तीसरे बालक को व इस प्रकार श्रंृखला चलती है।
अध्यापक बालकों की विभिन्न गतिविधियों में मित्रता के प्रतिमानों को समझे। अध्यापक कक्षा में एकाकी बालको को पहचान कर समूह में उनके समायोजन में सहायता करे। अध्यापक को यह भी देखना होगा कि कक्षा में समूह जाति व धर्म के आधार पर न बने।

कक्षा समूह में सम्बन्ध - 

कक्षा की संरचना समूह में सदस्यों के मध्य सम्बन्धों को निर्धारित करती हैं। इन सम्बन्धों की व्याख्या समूह के कार्यो के सन्दर्भ में की जानी चाहिए। किसी भी समूह का महत्त्वपूर्ण कार्य निर्णय लेना हैं। निर्णय कौन लेता है व कैसे लेता हैं। अन्र्तसम्बन्धों को निर्धारित करता हैं यदि अध्यापक सभी निर्णय स्वंय लेता हैं व विद्यार्थी उन निर्णयों के अनुरूप कार्य करते हैं तो अध्यापक विद्यार्थी सम्बन्ध औपचारिक व अधिनायकवादी होगेें। यदि निर्णयन प्रक्रिया में विद्यार्थियों की राय सम्मिलित है तो अन्र्तसम्बन्धों का स्वरूप अलग होेगा। इसी प्रकार से कार्य को करने एवं समस्या समाधान भी अन्र्तसम्बन्धों के निर्धारण के महत्त्वपूर्ण कारक हैं।

अन्य समूहों से सम्बन्ध - कक्षा समूह अन्य समूहों से भी सम्बन्ध स्थापित करता हैं। एक कक्षा समूह को दूसरे कक्षा समूहों के साथ तालमेल करना पड़ता हैं। विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के व्यवहारों केा उन्नत करने के लिए यह आवश्यक हैं। विभिन्न कक्षा समूह समान विद्यालयी कार्यक्रमों यथा वाद-विवाद, प्रार्थना सभा, खेल, विद्यालयी सभा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामुदायिक कार्य व उत्सवों में आपस में मिलते हैं। कक्षा कार्यक्रमों की सफलता उनके भव्य सम्बन्धों के प्रतिमान पर निर्भर करती हैं।

कक्षा समूह का अधिगम पर प्रभाव - 

कक्षा समूह की अधिगम को प्रभावित करने में अहम भूमिका हैं इस निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता हैं।

(1) समसमूह टयूटरिंग - वर्तमान में शैक्षिक उपलब्धि चयन का आधार हैं। ऐसी स्थिति में विद्यार्थी अपनी एकमात्र क्षमता का अधिकतम उपयोग करने हेतु बहुत बार अपने समवयस्क समूह द्वारा अधिगम में सहायता में समान प्रस्थिति व बौद्धिक क्षमता वाले विद्यार्थी अपने साथियों को सक्रिय सहायता प्रदान कर ज्ञान एवं कौशलो का अर्जन करते हैं। अपने ज्ञान व कौशलो का अर्जन कर सकते है। समूह के सदस्य एक दूसरे की अभिवृत्तियों , पसन्दगियों व मनोवृत्तियों को सकारात्मक रूप में प्रभावित करते हैं।

(2) सदयोगात्मक अधिगम - इस प्रकार का अधिगम भी समूह में सम्भव हैं। जब दो से अधिक विद्यार्थी एक साथ मिलकर किसी विषय या प्रोजेक्ट पर मिलकर कार्य करते हैं तो समूह में कार्य करते समय एक दूसरे के अधिगम अनुभवों व विचारों का लाभ उठाते हुये अधिगम के उच्चतम मानदण्डों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता हैं । एलबर्ट बान्डुरा एवं लेव वयोगटस्की जो कि सामाजिक अधिगम सिद्धांत के पक्षधर हैं ने भी सहयोगात्मक अधिगम का समर्थन किया हैं।

(3) अभिप्रेरणा - कक्षा समूह में विभिन्न समूह प्रक्रियाएं विद्यार्थियों को अभिप्रेरणा प्रदान करती हैं। अभिप्रेरणा अधिगम को अग्रसर करती हैं समूह प्रक्रियाएं इन विद्यार्थियों को अभिप्रेरित कर अधिगम सम्भाव्य को पूर्ण रूप से विकसित करने में सहायता प्रदान करती हैं।

(4) लक्ष्य निर्धारण - कक्षा समूह की प्रभावशीलता में योगदान देने वालो में प्रमुख तत्व लक्ष्यों का निर्धारण हैं। कक्षा समूह की रचना ही अधिगम के लिये की जाती हैं। विद्यार्थी व अध्यापक मिलकर लक्ष्यों व कार्यो का निर्धारण करते हैं। समूह के लक्ष्य व्यक्ति को अपने लक्ष्यो के निर्धारण एवं प्राप्ति के लिये दिशा-निर्देश देते हैं। समूह विद्यार्थियों के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहभागी बनकर सहयोग प्रदान करता हैं।

(5) सम्प्रेषण - किसी भी अनुदेशनात्मक समूह की मूलभूत आवश्यकता संदेश ग्रहण की हैं। कक्षा समूह की केन्द्रिय समस्या सम्प्रेषण की हैं। सम्प्रेषण के द्वारा विद्यार्थियों तक ज्ञान कौशलों, मूल्यों व अभिवृत्तियों को विकसित किया जाता हैं। अध्यापक विद्यार्थियों से पृष्ठ पोषण प्राप्त कर सम्प्रेषण की प्रभावशीलता को जानकर अपने सम्प्रेषण को प्रभावी बनाने के लिए योजना बनाता हैं जो अन्ततः अधिगम के सुगमीकरण को प्रभावित करता हैं। कक्षा समूह में समरसता, सह-अस्तित्व, चिन्तन व जीवन कौशलों का अधिगम बिना औपचारिकता के सहज, सरल व प्रभावी ढंग से होता है। अतःयह कहा जा सकता हैं कि समूह प्रक्रियाएं अधिगम में सहायता प्रदान करती हैं।

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