प्रमुख अधिगम प्रक्रियाएँ


जब अधिगम घटित होता है, चाहे यह प्राचीन अनुबंधन हो या क्रियाप्रसूत अनुबंधन, तब इसमें कुछ प्रक्रियाएँ घटित होती हैं। ये हैं - प्रबलन ; (Reinforcement), विलोप (Extinction) या अर्जित अनुक्रिया का घटित न होना, कुछ खास दशाओं में अधिगम का अन्य उद्दीपकों के प्रति सामान्यीकरण (Generalisation), प्रबलन देने वाले तथा प्रबलन न देने वाले उद्दीपकों के बीच विभेदन ; (Discrimination), तथा स्वतः पुनःप्राप्ति (Spontaneous Recovery)

प्रबलन (Reinforcement)

प्रबलन प्रयोगकर्ता द्वारा प्रबलक देने की क्रिया का नाम है। प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं। हमने देखा है कि प्रबलित अनुक्रियाओं की दर बढ़ जाती है जबकि अप्रबलित अनुक्रियाओं की दर घट जाती है। एक धनात्मक प्रबलक के मिलने के पहले जो अनुक्रिया घटित होती है उसकी दर बढ़ जाती है। ऋणात्मक  प्रबलक अपने हटने या समापन से पहले घटित होने वाली अनुक्रिया की दर बढ़ा देते हैं। प्रबलक प्राथमिक या द्वितीयक हो सकते हैं। एक प्राथमिक प्रबलक (primary reinforcer) जैविक रूप से महत्वपूर्ण होता है चूँकि यह प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है ;जैसे- एक भूखे प्राणी के लिए भोजनद्ध। एक द्वितीयक प्रबलक वह प्रबलक है जिसने पर्यावरण के साथ प्राणी के अनुभव के कारण प्रबलक की विशेषताएँ प्राप्त कर ली होती हैं। हम बहुधा धन, प्रशंसा और श्रेणियों का उपयोग इसी तरह के प्रबलक के रूप में करते हैं। इन्हें द्वितीयक प्रबलक (secondary reinforcer) कहते हैं। प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है। ऐसी अनुक्रिया की रचना वांछित अनुक्रिया के निरंतर अनुमानों के प्रबलन द्वारा होती है।

विलोप (Extinction)

विलोप का तात्पर्य अधिगत अनुक्रिया के लुप्त होने से है जो प्रबलन को उस परिस्थिति से हटा लेने के कारण होती है जिसमें अनुक्रिया घटित हुआ करती थी। प्राचीन अनुबंधन में अनुबंधित उद्दीपक-अनुबंधित अनुक्रिया (CS – CR) के घटित होने के बाद यदि अननुबंधित उद्दीपक (US) घटित नहो या लीवर दबाने के बाद स्किनर बाॅक्स में यदि भोजन न मिले तो इन सब स्थितियों में सीखा हुआ व्यवहार क्रमशः दुर्बल हो जाता है और अंत में लुप्त हो जाता है।

अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध (resistance to extinction) भी प्रदर्शित करती है। इसका तात्पर्य है कि सीखी हुई अनुक्रिया प्रबलित न होने पर भी कुछ समय तक होती रहती है। तथापि बिना प्रबलन वाले प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ अनुक्रिया का बल धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है और अंततोगत्वा अनुक्रिया होनी बंद हो जाती है। कोई सीखी हुई अनुक्रिया कितने समय तक विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करेगी यह कई कारकों पर निर्भर करता है। यह पाया गया है कि सीखते समय प्रबलित प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है और अधिगत अनुक्रिया अपने सबसे उँफचे स्तर तक पहुँचती है। इस स्तर पर उपलब्धि स्थिर हो जाती है। इसके बाद प्रयासों की संख्या का अनुक्रिय के बल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। विलोप का प्रतिरोध अर्जन प्रयासों के दौरान प्रबलनों की संख्या बढ़ने के साथ बढ़ता है। इस वृ(ि से ऊपर प्रबलनों की संख्या बढ़ने पर विलोप का प्रतिरोध घटता है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि जैसे-जैसे अर्जन प्रयासों के दौरान प्रबलन की मात्रा (भोज्य पदार्थ की संख्या) बढ़ती है, विलोप का प्रतिरोध घटता है।

यदि अर्जन प्रयासों के दौरान प्रबलन विलंब से मिले तो विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है। प्रत्येक अर्जन प्रयास में प्रबलन सीखी हुई अनुक्रिया को विलोप के प्रति कम प्रतिरोधी बना देता है। इसके विपरीत, अर्जन के समय रुक-रुक कर या आंशिक प्रबलन देना सीखी गई अनुक्रिया को विलोप के प्रति अधिक प्रतिरोधी बना देता है।

सामान्यीकरण तथा विभेदन (Generalisation and Discrimination)

सामान्यीकरण  (generalisation) तथा विभेदन (discrimination) की प्रक्रियाएँ हर प्रकार के अधिगम में पाई जाती हैं। तथापि इनका विस्तृत अध्ययन अनुबंधन के संदर्भ में किया गया है। मान लीजिए, एक प्राणी को अनुबंधित उद्दीपक (प्रकाश या घंटी की ध्वनि) प्रस्तुत करने पर अनुबंधित अनुक्रिया (लार स्त्राव या कोई अन्य प्रतिवर्ती अनुक्रिया प्राप्त )करने के लिए अनुबंधित किया गया है। अनुबंधन स्थापित हो जाने के बाद जब अनुबंधित उद्दीपक के समान कोई दूसरा उद्दीपक (जैसे- टेलीपफोन का बजना) प्रस्तुत किया जाए तो प्राणी इसके प्रति अनुबंधित अनुक्रिया करता है। समान उद्दीपकों के प्रति समान अनुक्रिया करने के इस गोचर को सामान्यीकरण कहते हैं। दोबारा, मान लीजिए कि एक बच्चा एक खास आकार और आकृति वाले उस जार की जगह को जान गया है, जिसमें मिठाइयाँ रखी जाती हैं। जब माँ पास में नहीं रहती है तो भी बच्चा जार को खोज लेता है और मिठाई प्राप्त कर लेता है। यह एक अधिगत क्रियाप्रसूत है। अब मिठाइयाँ एक दूसरे जार में रख दी गईं, जो एक भिन्न आकार तथा आकृति का है और रसोईघर में दूसरी जगह रखा हुआ है। माँ की अनुपस्थिति में बच्चा जार को ढँूढ़ लेता है और मिठाई प्राप्त कर लेता है। यह भी सामान्यीकरण का एक उदाहरण है। जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं।

एक दूसरी प्रक्रिया जो सामान्यीकरण की पूरक है, विभेदन कहलाती है। सामान्यीकरण समानता के कारण होता है, जबकि विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया होती है। उदाहरणार्थ, मान लीजिए, एक बच्चा काले कपड़े पहने व बड़ी मूँछों वाले व्यक्ति से डरने की अनुक्रिया से अनुबंधित है। बाद में जब वह एक नए व्यक्ति से मिलता है, जो काले कपड़ों में है और दाढ़ी रखे हुए है तो बच्चा भयभीत हो जाता है। बच्चे का भय सामान्यीकृत है। वह एक दूसरे अपरिचित से मिलता है जो धूसर कपड़ों में है और दाढ़ी-मूँछ रहित है तो बच्चा नहीं डरता है। यह विभेदन का एक उदाहरण है। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विपफलता है। विभेदन की अनुक्रिया प्राणी की विभेदक क्षमता या विभेदन के अधिगम पर निर्भर करती है।

स्वतः पुनःप्राप्ति (Spontaneous Recovery)

स्वतः पुनःप्राप्ति किसी अधिगत अनुक्रिया के विलोप होने के बाद होती है। मान लीजिए, एक प्राणी प्रबलन प्राप्त करने के लिए एक अनुक्रिया करना सीखता है। इसके बाद अनुक्रिया विलुप्त हो जाती है और कुछ समय बीत जाता है। यहाँ पर एक प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या अनुक्रिया पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है और अनुबंधित उद्दीपक प्रस्तुत करने पर अनुक्रिया घटित नहीं होगी। यह पाया गया है कि कापफी समय बीत जाने के बाद सीखी हुई अनुबंधित अनुक्रिया का पुनरु(ार हो जाता है और वह अनुबंधित उद्दीपक के प्रति घटित होती है। स्वतः पुनःप्राप्ति की मात्रा विलोप के बाद बीती हुई समयावधि पर निर्भर करती है। यह अवधि जितनी ही अधिक होती है, अधिगत अनुक्रिया की पुनःप्राप्ति उतनी ही अधिक होती है। ऐसी पुनःप्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है।

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