गैने द्वारा दिये गये अधिगम के प्रकार (Types of Learning by Gagne)

आधुनिक अनुदेशन सिद्धान्तों का जनक राबर्ट गेने को माना जाता हैं। जिन्होने सर्वप्रथम अपने विचार रखे बाद में ब्रूनर तथा कारौल ने गेने के विचारो से सहमत होकर अपने-अपने सिद्धान्त विकसित किये। राबर्ट एम. गेने अधिगम के स्वरूप के स्पष्टीकरण के लिए अधिगम के विभिन्न सिद्धान्तों के विश्लेषण को पर्याप्त नहीं समझते हैं उनके अनुसार कोई भी सिद्धान्त अधिगम की प्रक्रिया का पूर्ण समाधान करने में असमर्थ है।
वस्तुतः अधिगम के स्वरूप को वास्तविक रूप से समझने के लिए हमें अधिगम परिस्थितियों का निरीक्षण, परीक्षण एवं उनकी व्याख्या करनी पड़ेगी। साथ ही इनका यह भी तात्पर्य हैं कि किसी एक प्रकार के व्यवहार के अधिगम के लिए पूर्व आवश्यकताओं की आवश्यकता होती हैं 

इस प्रकार गेने द्वारा वर्णित आठ अधिगम प्रकारों को एक-दूसरे की परम आवश्यकता हैं अर्थात यदि अधिगम के दूसरे प्रकार की जानकारी प्राप्त करनी है तो अधिगम के पहले प्रकार (परिस्थिति) का ज्ञान अपेक्षित हैं। दूसरे शब्दों में इसको यह भी कहा जा सकता है। प्रत्येक नवीन अधिगम के पूर्व उससे निम्न स्तर वाला अधिगम आवश्यक है और यही इस स्तर के अधिगम की पूर्वापेक्षित योग्यता होती है अधिगम के दौरान अधिगमकर्ता (विद्यार्थी) कोई नया अन्तिम व्यवहार उस समय तक अर्जित नहीं कर सकता हैं जब तक कि वह पूर्वापेक्षित योग्यताएँ विकसित नहीं कर लेता हैं जब तक कि वह पूर्वापेक्षित योग्यताएँ विकसित नहीं कर लेता। उदाहरण के लिए ‘बोध उद्देश्य‘ के लिए ज्ञान उद्देश्य की पूर्ण आवश्यकता होती हैं। गेने ने अधिगम के निम्नाकिंत आठ प्रकारों परिस्थितियों की व्याख्या की हैं इनको मौलिक रूप से अधिगम सिद्धान्तों से लिया गया हैं।

1. संकेत अधिगम - 

यह अधिगम परिस्थितियों की श्रंृखला में अधिगम का प्रथम प्रकार हैं इस प्रक्रिया में केवल संकेत मात्र से ही अधिगम कराया जाता हैं संकेत अधिगम पावलव द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय अनुबंधन पर आधारित होता हैं जिसमें प्राणी एक संकेत के प्रति प्रतिक्रियाए करना सीखता हैं।

2. उद्दीपक-अनुक्रिया अधिगम -

 थार्नडाइक के सम्बन्धवाद तथा स्किनर के विभेदीकृत कार्यात्म पर आधारित अधिगम का रूप है। गेने ने थार्नडाइक के प्रयास एवं मूल अधिगम तथा स्किनर के कार्य अनुबन्धन अधिगम को इस वर्ग के अन्तर्गत रखा इस प्रकार के अधिगम में प्राणी को एक विशिष्ट अधिगम वातावरण में रखा जाता हैं प्राणी के लिए वह वातावरण उद्दीपक का कार्य करता हैं फलतः वह प्रतिक्रियाएं करता हैं सही प्रतिक्रियाओं की पुष्टि करके ही स्थिरीकरण किया जाता हैं इससे प्राणी के अधिगम को स्थायित्व मिलता हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता हैं कि किसी उद्दीपक की उपस्थिति से जब किसी अनुक्रिया का होना सम्भव हो जाए तो वहां हम उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम की परिस्थिति कहेगें।

इस अधिगम के द्वारा छोटे बच्चों को शब्दोच्चारण सिखाया जा सकता हैं इसके अतिरिक्त कई अन्य क्रियाओं जैसे उसके आचरण, भय आदि को सकारात्मक पुनर्बलन देकर हटाया जा सकता हैं।

3. श्रृंखला अधिगम-

प्राणी जब संकेत अधिगम एवं उद्दीपक अनुक्रिया सम्बन्ध अधिगम से पूर्ण रूप से परिचित हो जाता हैं तभी श्रृखंला अधिगम की प्रक्रिया प्रारम्भ की जा सकती है स्किनर ने भी इस प्रकार के अधिगम की व्याख्या की है इसमें उद्दीपक अनुक्रिया को लगातार एक क्रम से उपस्थित किया जाता हैं जिससे ‘‘श्रृखंला अधिगम की स्थिति उत्पन्न होती हैं‘‘। 

गेने ने दो प्रकार के श्रृंखला अधिगम की व्याख्या की हैं। पहली हैं शाब्दिक श्रंृखला अधिगम तथा दूसरा अशाब्दिक श्रंृखला अधिगम। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत से शिक्षण प्रतिमानों में शाब्दिक अधिगम की ही परिस्थिति उत्पन्न की जाती हैं जैसे अभिक्रमित अनुदेशन में शाब्दिक श्रंृखला की परिस्थिति उत्पन्न कर सीमाओं को तार्किक क्रम में प्रस्तुत किया जाता हैं। अशाब्दिक श्रृंखला अधिगम हेतु चित्रों व अन्य दृश्य साधनों का प्रयोग किया जाता हैं।

4. शाब्दिक साहचर्य अधिगम - 

अधिगम परिस्थिति का यह प्रकार श्रंृखला अधिगम का ही एक प्रकार हैं जब यह श्रंृखला शारीरिक क्रियाओं यान्त्रिक क्रियाओं अथवा अशाब्दिक रूप में प्रस्तुत होती हैं तो उन्हें अशाब्दिक श्रंृृखला अधिगम कहते हैं। यही श्रृंखला जब शाब्दिक अवयवों सम्बन्धी हो जाती है तो हमे उन्हें वाचिक श्रृंखला अधिगम परिस्थिति कहते हैं। 

गेने के अनुसार- ‘‘लम्बी श्रृंखलाओं को छोटी-छोटी इकाइयों में तोड़कर अधिगम को अधिक सफल व प्रभावी बनाया जा सकता हैं। यहां यह ध्यान देने की बात हैं कि विषयवस्तु से परिचित होने पर तात्कालिक स्मृति का विस्तार बढ़ता हैं तथा पूर्व अधिगम से समायोजित एवं संगठित होती हैं‘‘ अण्डरवुड (1964) ने इस अधिगम परिस्थिति को मानव अधिगम प्रक्रिया में अधिक महत्त्वपूर्ण माना हैं विशेष रूप से भाषा अधिगम के लिए यह परिस्थिति अत्यन्त ही अनुकूल हैं।

5. विभेद अधिगम - 

इस अधिगम प्रक्रिया के लिए वाचिक तथा अवाचिक श्रंृखला अधिगम पूर्व ज्ञान का काम करते हैं इस प्रकार के अधिगम में उच्च स्तरीय मानसिक प्रक्रिया सम्मिलित होती हैं। विभेद अधिगम के अन्तर्गत किसी विशेष परिस्थिति पर प्राप्त विभिन्न उत्तेजनाओं को पहचानकर उसमें विभेदकर किसी विशिष्ट उत्तेजना हेतु अनुक्रिया की जाती हैं। इसमें शिक्षक छात्रों में ऐसी क्षमता उत्पन्न करने का प्रयास करता हैं जिससे कि वह दो श्रृंखलाओं का भेद कर सके। इस विभेदीकरण की क्षमता का अर्जन बालक में प्रारम्भिक अवस्था से ही प्रारम्भ हो जाता हैं। इसका महत्त्व बालक के दैनिक जीवन में अधिक हैं। बालक अपने दैनिक जीवन में विभिन्न अंगो में भेद करता हैं यथा - रंगो में, आकार में, बनावट में दूरी में आदि। इस विभेद करने में बालक को मानसिक प्रक्रिया के एक प्रारूप से गुजरना पड़ता हैं यह सरल प्रक्रिया नहीं हैं।

6. सम्प्रत्यय अधिगम - 

इस अधिगम परिस्थिति के लिए भेदीय अधिगम का ज्ञान पूर्ण आवश्यक है। केन्डलर (1964) ने सर्वप्रथम सम्प्रत्यय अधिगम का उल्लेख किया। राबर्ट गेने ने इसे आगे बढ़ाया। जब छात्र किसी वस्तु, घटना या व्यक्ति के वर्ग या समूह को एक नामकरण के रूप में अधिगम करता हैं तो वह प्रत्यय अधिगम हैं गेने ने सम्प्रत्यय अधिगम को इस प्रकार से परिभाषित किया हैं- ‘‘जो अधिगम व्यक्ति में किसी वस्तु या घटना को एक वर्ग के रूप में अनुक्रिया करना सम्भव बनाते हैं उन्हे हम सम्प्रत्यय अधिगम कहते हैं।

7. सिद्धान्त अधिगम - 

राबर्ट एम. गेने के अनुसार सिद्धान्त अधिगम अधिगम की सातवी परिस्थिति हैं जिसकी पूर्व आवश्यकता सम्प्रत्यय अधिगम हैं बिना सम्प्रत्यय अधिगम के सिद्धान्त के अधिगम कराना असम्भव प्रतीत होता हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहां जा सकता हैं कि संप्रत्यय अधिगम सिद्धान्त अधिगम हेतु पूर्ण ज्ञान का भी कार्य करता हैं। यदि छात्रों को सम्प्रत्ययों का पूर्ण ज्ञान हैं तब शिक्षक छात्र के सम्मुख दो या दो से अधिक सम्प्रत्ययों के सहयोग से निर्मित सिद्धान्त अधिगम की परिस्थिति उत्पन्न करता हैं। इसमें छात्रों के व्यवहार को इस प्रकार नियन्त्रित किया जाता हैं कि वह सिद्धान्त को वाचिक रूप से (verbal)कह सके तथा उसे व्यवहार में उतार सके।

8. समस्या -समाधान अधिगम - 

यह गेने द्वारा वार्णित अधिगम की आठवी परिस्थिति हैं। समस्या समाधान द्वारा सीखना, सीखने की श्रेणी में सर्वोच्च स्तर पर समस्या समाधान आता हैं। समस्या समाधान किसी समस्या को हल करने, नई प्रक्रिया को सुलझाने व ज्ञान परिस्थितियों के आधार पर परिणामों का पूर्वानुमान लगाकर कार्य करने से सम्बन्धित हैं। गेने का मानना हैं कि सम्प्रत्यय एवं सिद्धान्त अधिगम की क्षमता की उपलब्धि के बिना समस्या का अधिगम सम्भव नहंी हैं । गेने के अनुसार- ‘‘समस्या समाधान घटनाओं का ऐसा समूह हैं जिसमें मानव किसी विशिष्ट उद्देश्य की उपलब्धि के लिए अधिनियमों अथवा सिद्धान्तों का उपयोग करता हैं।

राबर्ट गेने द्वारा प्रतिपादित अधिगम में आठ प्रकार (उपर्युक्त परिस्थितियाँ) वस्तुतः अधिगम में विभिन्न सिद्धान्तों की प्रक्रियाओं पर आधारित हैं जिसमें पावलव, स्किनर, थार्नडाइक, गुथरी, कोहलर, कोफ्का व वर्दीमर आदि मनोवैज्ञानिकों के अलग-अलग सिद्धान्तों से उपलब्ध प्रक्रियाओं का सारांश संकलित हैं। इस दृष्टिकोण का विश्लेषण एक सिद्धान्त में सम्भव नहीं हैं वस्तुतः अधिगम की प्रक्रिया विभिन्न जटिल परिस्थितियों का साक्षात्कार (सामना) करती हैं अतः अधिगम की व्याख्या उपर्युक्त वर्णित आठ परिस्थितियों के माध्यम से ही स्पष्ट किया जा सकता हैं जो परस्पर श्रंृखलाबद्ध व एक-दूसरे की पूर्व आवश्यकता हैं। किसी विशिष्ट प्रक्रिया के अधिगम हेतु अधिगमकर्ता को संकेत अधिगम से समस्या समाधान अधिगम तक की प्रक्रिया से गुजरना होता हैं।

<< बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र

Post a Comment Blogger

 
Top