12 July 2018

दवाई के साथ पेट में जाएगा ये कैमरा और फिर ......

दवाई के साथ पेट में जाएगा ये कैमरा और फिर ......


 विज्ञान ने आज इतनी तरक्की कर ली है कि कोई भी बीमारी इसकी पहुँच से परे नहीं है। जानलेवा बीमारियों को भी चिकित्सा विज्ञान ने शोध के जरिए काबू में कर लिया है। लेकिन, हमारी छोटी आंत की ऐसी बहुत सी बीमारियां थी जो इसकी गिरफ्त में नहीं आ रही थीं। जैसे, कैंसर। एंडोस्कोपी के जरिए भी सिर्फ बड़ी आंत या पेट तक ही पहुँचा जा सकता था। इस गोली में माइक्रो कैमरा लगा होता है जो छोटी आंत के अंदर का हाल बयान करता है। ये माइक्रो कैमरा फोटो और वीडियो दोनों बना लेता है। इस कैमरे से चमकीली सफेद किरणें निकलती है, जो आंत के ऊतकों पर पड़ती हैं। इन्हीं के जरिए ये माइक्रो कैमरा छोटी आंत के हालात को बाहर स्क्रीन पर दिखाता है। जिस गोली में ये कैमरा फिट होता है, उसे ऐसी चीज से तैयार किया जाता है कि वो खाना पचाने के लिए निकलने वाले रसायनो से गलती नहीं। जाँच के समय मरीज के पेट पर एक बेल्ट बांध दी जाती है, जिसमें रेडियो सेंसर और डेटा रिकॉर्डर लगा होता है। कैमरे वाली गोली निगलने के साथ ही बेल्ट पर हर सेकेंड में दो चित्र आते हैं। अगर वीडियो पर्याय लिया जाये तो लाइव फीड भी देखी जाती है। मरीज के पाचन तंत्र से ये गोली दस से 48 घंटे के बीच निकलती है। 48 घंटे के बाद मरीज फिर से अस्पताल में आता है। जहाँ फोटो और वीडियो की मदद से कंप्यूटर पर छोटी आंत की कमियों की पड़ताल की जाती है। किसी बीमारी के होने-न होने का पता लगाया जाता है। कैप्सूल वाले इस कैमरे की मदद से अब छोटी आंत में कैंसर होने का जल्द पता लगाया जा सकेगा।
विज्ञान ने आज इतनी तरक्की कर ली है कि कोई भी बीमारी इसकी पहुँच से परे नहीं है। जानलेवा बीमारियों को भी चिकित्सा विज्ञान ने शोध के जरिए काबू में कर लिया है। लेकिन, हमारी छोटी आंत की ऐसी बहुत सी बीमारियां थी जो इसकी गिरफ्त में नहीं आ रही थीं। जैसे, कैंसर। एंडोस्कोपी के जरिए भी सिर्फ बड़ी आंत या पेट तक ही पहुँचा जा सकता था।
इस गोली में माइक्रो कैमरा लगा होता है जो छोटी आंत के अंदर का हाल बयान करता है। ये माइक्रो कैमरा फोटो और वीडियो दोनों बना लेता है। इस कैमरे से चमकीली सफेद किरणें निकलती है, जो आंत के ऊतकों पर पड़ती हैं। इन्हीं के जरिए ये माइक्रो कैमरा छोटी आंत के हालात को बाहर स्क्रीन पर दिखाता है।
जिस गोली में ये कैमरा फिट होता है, उसे ऐसी चीज से तैयार किया जाता है कि वो खाना पचाने के लिए निकलने वाले रसायनो से गलती नहीं। जाँच के समय मरीज के पेट पर एक बेल्ट बांध दी जाती है, जिसमें रेडियो सेंसर और डेटा रिकॉर्डर लगा होता है।
कैमरे वाली गोली निगलने के साथ ही बेल्ट पर हर सेकेंड में दो चित्र आते हैं। अगर वीडियो पर्याय लिया जाये तो लाइव फीड भी देखी जाती है। मरीज के पाचन तंत्र से ये गोली दस से 48 घंटे के बीच निकलती है। 48 घंटे के बाद मरीज फिर से अस्पताल में आता है। जहाँ फोटो और वीडियो की मदद से कंप्यूटर पर छोटी आंत की कमियों की पड़ताल की जाती है। किसी बीमारी के होने-न होने का पता लगाया जाता है।
कैप्सूल वाले इस कैमरे की मदद से अब छोटी आंत में कैंसर होने का जल्द पता लगाया जा सकेगा।

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