1 July 2018

आंग्ल-बर्मा सम्बन्ध

आंग्ल-बर्मा सम्बन्ध


बर्मा में कंपनी की प्रारंभिक गतिविधियाँ

भारत के पूर्व में बर्मा देश है जिसे म्यान्मार भी कहा जाता है। भारतीय साम्राज्य की रक्षा के लिए स्वाभाविक था कि कांग्रेस पूर्वी सीमा की भी रक्षा करे। मुगल सम्राटों ने आसाम के कुछ भागों को जीतकर अपने साम्राज्य में शामिल किया था। बंगाल पर अधिकार करने के बाद कंपनी ने बर्मा के साथ संबंधों पर ध्यान दिया।

बर्मा का राजा चीन के सम्राट के समान स्वयं को विश्व विजेता समझता था। दूसरी ओर अंग्रेजों को भी भारत में आशातीत सफलताएँ प्राप्त हुर्इ थीं। ऐसे वातावरण में अंग्रेजों तथा बर्मा के मध्य युद्ध हो जाना स्वाभाविक था। सर जान शारे तक अंग्रेजों को नीति रही थी कि वे अराकान में आकर छिपने वाले लुटेरों को बर्मी सैनिकों को देते थे लेकिन वेलेजली ने कड़ा रूख अख्तियार किया और लुटेरों के समर्पण करने से मना कर दिया। 1816 में बर्मी राजा ने आसाम पर अधिकार कर लिया। आसाम के राजा चन्द्रकातं को अंग्रेजों ने अपने राज्य में शरण दी और आसाम में छापे मारने में भी उसकी सहायता की। चिटगाँव से भी लुटेरों के छापे बढ़ गय।े इन कारणों से बर्मा का राजा अंग्रेजों से नाराज हो गया। नेपाल युद्ध में अंग्रेजों को जिन असफलताओं का सामना करना पड़ा, उनसे बर्मी लोगों का साहस बढ़ा और वे समझने लगे कि अंग्रेजों को पराजित करना आसान कार्य है। इसलिए जब लार्ड हेस्ंिटग्ज पिण्डारियों के विरूद्ध कार्यवाही में लगा हुआ था तब आवा के राजा ने लार्ड हेस्ंिटग्ज के पास एक पत्र भेजकर माँग की कि चिटगाँव, ढाका, मुर्शिदाबाद और कासिमबाजार उसके सुपुर्द कर दिये जायें। उसका दावा था कि ये सभी क्षेत्र अराकान के राजा को कर देते थे, अत: अब उसकी अधीनता में हैं। हेस्ंिटग्ज ने इस पत्र का उत्तर नहीं दिया बल्कि यह कहकर लौटा दिया कि पत्र जाली था लेकिन अंग्रेजों को स्पष्ट हो गया था कि अपने राज्य की पूर्वी सीमा की सुरक्षा करने के लिए उन्हें आवा सरकार को पराजित करना आवश्यक था। अत: दोनों के मध्य युद्ध अवश्यसंभावी हो गया।

प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824-1826 र्इ.)

युद्ध के कारण

युद्ध का वास्तविक कारण अंग्रेजों और साम्राज्यवादी तथा व्यापारिक आकांक्षाएँ थीं। इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी थे -
  1. बंगाल और अराकान की सीमायें निर्धारित नहीं थी। बर्मियों द्वारा जीते हुए प्रदेश से लुटेरे भाग कर अंग्रेजी क्षेत्र में शरण लेते थे। बर्मी सरकार उनके समर्पण की माँग करती थी लेकिन अंग्रेजों ने इसे स्वीकार नहीं किया। 
  2. इस समय कंपनी के सिपाहियों से कभी-कभी बर्मी सैनिकों की मुठभेड़ हो जाती थी, इसमें उन्हें सफलता प्राप्त होती थी। इससे आवा नरेश को विश्वास हो गया कि वह अंग्रेजों को पराजित कर सकता था।
  3. अंग्रेजों ने 1795 से 1811 र्इ. तक कर्इ राजदूत बर्मी सरकार से संबंध स्थापित करने के लिए भेजे। किन्तु बर्मा द्वारा इन राजदूतों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया। 
  4. मणिपुर (1813 र्इ.) पर अधिकार करकने बाद बर्मी सेनाओं ने आसाम (1816 र्इ.) को भी जीत लिया। अंग्रेजों ने आसाम के राजा को शरण दी। अंग्रेजों की सहायता से आसाम और अराकान पर छापेमार हमले होते थे। 
  5. 1818 र्इ. आवा नरेश ने लार्ड हेस्टिंग्स को पत्र भेजकर चटगाँव, मुर्शिबाद, ढाका और कासिमबाजार को समर्पित कर देने की माँग की। इस समय हेि स्ंटग्स पिण्डारियों का दमन करने में व्यस्त था। अत: उसने पत्र को जाली मानकर लौटा दिया। 
  6. युद्ध का तात्कालिक कारण चटगाँ के निकट शाहपुरी द्वीप क विवाद था। 1823 र्इ. में बर्मियों ने इस द्वीप पर अधिकार कर लिया। गवर्नर जनरल एमहस्र्ट ने आवा नरेश से माँग की कि वह द्वीप को लौटा दे। उसके मना करने पर एमहस्र्ट ने युद्ध की घोषणा कर दी। शाहपुरी द्वीप के अतिरिक्त कछार का विवाद भी था। एमहस्र्ट कछार पर बर्मियों की सत्ता स्वीकर करने को तैयार नहीं था क्योंकि बर्मा से बंगाल का सरल मार्ग कछार होकर था। इस समय कछार का राजा गोविन्दचन्द्र था जो बर्मा के राज्य का करद राजा था। उसे बर्मियों ने सहायता देकर राजा बनाया था। एमहस्र्ट ने कछार पर बर्मियों की सत्ता को स्वीकार कर दिया। 
  7. युद्ध का वास्तविक कारण ब्रिटिश साम्राज्यवाद था। भारत में अंग्रेजों की सर्वोच्च सत्ता स्थापित हो चुकी थी। अब वे बंगाल के पूर्व में विस्तार चाहते थे। उनकी दृष्टि अराकान, कछार और आसाम पर थी। इसके अलावा वे बर्मा में बिना किसी बाधा के व्यापार चाहते थे। बर्मा ठीक लकड़ी और लाख की माँग इंग्लैण्ड और यूरोप में बढ़ रही थी।

युद्ध की घटनाएँ

बर्मा की सेनाओं को सर्वोत्तम सुरक्षा प्रकृति ने प्रदान की थी। घने जंगल, पहाड़ और अनेक नदियाँ होने के कारण अंग्रेजों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनका देश जंगल और दलदल का एक विस्तृत फैलाव था। बर्मी सैनिक अंग्रेजी सेना की तरह प्रशिक्षित सैनिक नहीं थे किंतु अपने देश की जटिल प्राकृतिक अवस्था में लड़ने में अत्यंत कुशल थे।

आक्रमण की पहल बर्मी सेनापति महाबंदूला ने की। उसने बंगाल की पूर्वी सीमा पर आक्रमण कर दिया और चिटगाँव के पास रामू नामक स्थान पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेजों की योजना यह थी कि समुद्र मार्ग से आक्रमण करके रंगून पर कब्जा कर लिया जाये और वहाँ से दरावती नदी के मार्ग से जहाज आवा पहुँच जाये। इसके लिए सर आर्चोबाल्ड केम्पबेल के सेनापतित्व में सेना भेजी गयी। इसमें ग्यारह हजार सैनिक थे जिनमें अधिकांश मद्रास के सिपाही थे। इस सेना के साथ जहाज भी भेजे गये थे। इस सेना ने जल मार्ग से रंगून पहुँचकर बंदरगाह व नगर पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेजों ने दूसरी सेना उत्तर-पूर्व के स्थल मार्ग से भेजी। इस सेना का उद्देश्य रक्षात्मक युद्ध के द्वारा उन प्रदेशों को जीतना था जिन पर हाल में बर्मियों ने अधिकार कर लिया था अर्थात् आसाम, कछार और मणिपरु । ब्रिटिश सैनिकों ने आसाम से बर्मियों को खदेड़ दिया लेकिन सहाबन्दूला ने चिटगाँव की सीमा रामू पर एक ब्रिटिश सैन्य दल को मार भगाया। अंग्रेजों को आशा थी कि इस क्षेत्र के मोन लागे बर्मियों के विरूद्ध विद्राहे कर देगें जिससे उन्हें आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी लेकिन बर्मियों ने मोन लोगों को यहाँ से हटा दिया। फलस्वरूप अंग्रेजों को खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ा और उनके सैनिकों को बहुत कष्ट उठाना पड़ा। वर्षा के कारण अस्वास्थ्यकर जलवायु से भी सैनिकों को कष्ट हुआ। वर्षा समाप्त होने के बाद महाबन्दूला बर्मी सेना के साथ पुन: आया। वह फिर पराजित हुआ और भागकर दोनाब्यू पहुँचा। 15 दिसम्बर, 1825 र्इ. को यहाँ युद्ध हुआ जिसमें वह मारा गया। इसके बाद केम्पबेल ने प्रोम पर अधिकार कर लिया। इस स्थान से वह राजधानी आवा की ओर बढ़ा। बर्मियों में युद्ध करने की शक्ति नहीं रह गयी थीं। अत: यान्दबू नामक स्थान पर संधि हो गयी। इसकी शर्तें केम्पबले ने लिखवायी थीं।

यान्दबू की संधि

24 फरवरी, 1826 र्इ. को यह संधि हुर्इ। इसकी शर्तें इस प्रकार थीं -
  1. बर्मा के शासक ने अराकान और टिनासिरम के प्रांत अंग्रेजों को दे दिये। 
  2. बर्मा की सरकार ने आसाम, कछार, जेन्तिया में हस्तक्षपे न करने का वचन दिया और मणिपरु की स्वतंत्रता स्वीकार कर ली। 
  3. बर्मा के शासक ने अपने दरबार में अंगे्रजों को एक कराडे  रूपया देना स्वीकार किया। 
  4. बर्मा के शासक ने अपने दरबार में अंग्रेज रेजीडेण्ट रखना स्वीकार किया। 
  5. बर्मा के शासक ने अंग्रेजों से व्यापारिक संधि करने तथा व्यापारिक सुविधाएँ देना स्वीकार किया। एक बर्मा दूत को कलकत्ता आने की अनुमति मिली।
1826 र्इ. में बर्मा के साथ अंग्रेजों ने एक व्यापारिक बोदौपाया संधि की जिसमें अंगे्रजों की सभी माँगें स्वीकार कर ली गयीं। बर्मी राजा विक्षिप्त हो गया। 1837 र्इ. में गद्दी से उतार दिया गया और उसके भार्इ थारावादी को गद्दी पर बिठाया गया। वास्तव में, बर्मा की सरकार अंग्रेजों से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहती थी। अत: उसने अपना दूत कलकत्ता नहीं भजे ा। 1837 र्इ. में जब थारावादी गद्दी पर बैठा, तब उसने यान्छबू की संधि को अस्वीकार कर दिया। बर्मी परम्परा के अनुसार नये राजा को पहले की गयी संधियों को स्वीकार या अस्वीकार करने करने का अधिकार होता था।

समीक्षा

आंग्ल-बर्मा युद्ध की कटु आलोचना की गयी है। कहा गया है कि एमहस्र्ट ने युद्ध की ठीक व्यवस्था नहीं की और अंग्रेजों को जन-धन की बड़ी बर्बादी उठानी पड़ी है। अकुशलता के साथ एमहस्र्ट की यह भी आलोचना भी की गयी है कि उसने स्थिति का दृढ़ता से सामना नहीं किया लेकिन उसकी नीति सफल रही और अंग्रेजों का बर्मा के समुद्रतीय प्रदेश, व्यापार के अधिकार, आसाम, कछार, मणिपुर के प्रदेश प्राप्त हुए।

यान्दबू की संधि से बर्मी-अंग्रेज शत्रुता का अंत नहीं हुआ। बर्मा के नये राजा ने संधि को मानने से इंकार कर दिया। दूसरी ओर, अंग्रेजों को केवल तात्कालिक लाभ प्राप्त हुए थे लेकिन वे बर्मा पर प्रभावपूर्ण नियंत्रण चाहते थे। अत: द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध अवश्यम्भावी था।

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1852)

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध लार्ड डलहौजी के शासनकाल में हुआ। लार्ड डलहौजी घोर साम्राज्यवादी था। उसने जिस प्रकार भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का विस्तार किया, उसी प्रकार उसने बर्मा के मामले में भी विस्तारवादी नीति अपनायी।

यान्दूब के बाद की स्थिति

बर्मा ने आवा नरेश अंग्रेजों से किसी प्रकार के राजनीतिक या व्यापारिक संबंध नहीं रखना चाहते थे। संभवत: वे जानते थे कि भारत में अंगे्रंजों ने क्या किया है। यान्दूब की संधि के अनुसार आवा के राजा को अपना दूत कलकत्ता भेजना था लेकिन उसने दूत नहीं भेजा। वह यह भी नहीं चाहता था कि उसके दरबार में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रहे। 1830 र्इ. से 1840 र्इ. के वर्षो में दा े ब्रिटिश रेजीडेण्ट मेजर बर्नी और कर्नल बेनसन, आवा दरबार में रहे। दरबार में उनका सम्मान नहीं था और उन्हें कठोर शिष्टाचार का पालन करना पड़ता था। अत: 1840 र्इ. के बाद ब्रिटिश रेजीडेण्ट आवा दरबार में नहीं भेजा गया।

बर्मियों को अंग्रेजों पर गहरा संदेह था। 1836 र्इ. में चीन के सम्राट ने आवा के राजा को एक पत्र में लिखा था कि अंग्रेज पीपल के पेड़ के समान थे। जिस राज्य में वे एक बार प्रवेश पा लेते थे, उसी पर छा जाते थे।

शेपर्ड और लेविस के प्रकरण

यान्दूब की सधि के पश्चात् बड़ी संख्या में अंग्रेज व्यापारी बर्मा में बसने लगे। यह स्वाभाविक था कि बर्मा में व्यापार करने वाले व्यापारी गवर्नर जनरल डलहौजी से संरक्षण तथा सहायता की आशा करते थे। डलहौजी भी साम्राज्य के प्रसार के लिए व्यापारियों की सहायता करना अपना कर्त्तव्य समझता था। इस स्थिति में आवा नरेश तथा अंग्रेज व्यापारियों के मध्य विवाद होना आवश्यक हो गया था। शपे र्ड के जहाज से एक नाविक समुद्र में कूद गया और तैरकर तट पर पहुँचा। लेविस का जहाज मारीशस से आ रहा था। उसके जहाज पर एक नाविक की मृत्यु हो गयी। रंगून के गवर्नर ने बर्मी कानून के अनुसार इनको अपराध माना और उन पर जुर्माने कर दिये। वास्तव में, शेपर्ड तथा लेविस ने बर्मी कानूनों का पालन नहीं किया और उद्दण्डता दिखार्इ। इसी प्रकार अन्य अंग्रेज व्यापारी आयात-निर्यात न देने के लिए बर्मी अधिकारियों के साथ धोड़ाधड़ी और झगड़ा करते रहते थे। वे आयात-निर्यात करों को हटाने की माँग कर रहे थे।

शेपर्ड और लेविस ने डलहौजी से शिकायत की। डलहौजी बर्मा के विरूद्ध कार्यवाही का अवसर तलाश कर रहा था। उसने बर्मी सरकार से झगड़ा करने के लिए कमोडारे लेम्बर्ट को तीन युद्धपाते ों के साथ रंगून भेज दिया।

लेम्बर्ट का आक्रामक व्यवहार

डलहौजी का उद्देश्य विवाद को सुलझाना नहीं बल्कि सैनिक कार्यवाही की भूमिका तैयार करना था। डलहौजी ने यह भी जाँच करने का प्रयत्न नहीं किया कि उन दो व्यापारियों की क्या गलतियाँ थीं। डलहौजी के आदेश के अनुसार लेम्बर्ट ने रंगून पहुँचकर दो माँग े प्रस्तुत कीं - प्रथम, दोनों व्यापारियों को क्षतिपूर्ति 1000 रूपये दी जाये और द्वितीय, रंगून के गवर्नर को पद से हटाया जाये। बर्मा का राजा युद्ध से बचना चाहता इसलिए उसने रंगून के गवर्नर को पद से हटा दिया। नये गवर्नर को आदेश दिया गया कि वह जुर्माने के मामले को हल करें।

लेकिन लेम्बर्ट युद्ध करने पर उतारू था। उसने दूसरा बहाना ढूँढ लिया। 5 जनवरी, 1852 को उसने अपने कुछ असफरों को नये गवर्नर से मिलने भेजा। ये अफसर घोड़ों पर चढ़े हुए राज भवन के प्रांगण में चले गये। यह बर्मी शिष्टाचार के विरूद्ध था। बर्मी अधिकारियों को अनुमान था कि ये अधिकारी शराब पिये हुए थे। अत: उन्होंने कहा कि गवर्नर सो रहा है और उनसे नहीं मिल सकता है। लेम्बर्ट ने इसे अपमान माना और रंगून को घेरे कर गोलाबारी की। डलहाजै ी ने लेम्बर्ट के दुव्र्यव्हार को निंदा नहीं की बल्कि आवा के राजा को एक लाख पॉण्ड क्षतिपूर्ति के रूप में माँगा। उसने यह भी चेतावनी दी कि अगर 1 अपै्रल, 1852 तक उसे उत्तर प्राप्त नहीं हुआ तो युद्ध आरंभ जो जायेगा। आवा के राजा ने कोर्इ उत्तर नहीं दिया, अत: डलहौजी ने युद्ध की घोषणा कर दी।

युद्ध के कारण

  1. बर्मा का शासक अंग्रेजों को अपने राज्य में प्रवेश नहीं देना चाहता था। अत: उसने यान्दबू की संधि को स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों ने इसे युद्ध का कारण माना। 
  2. दक्षिणी बर्मा में अंग्रेज व्यापारी मनमानी कर रहे थे। वे चाहते थे कि बर्मा को अंग्रेजी आधिपत्य में ले लिया जाय े जिससे उन्हें लूट करने स्वतंत्रता प्राप्त हो जाये। 
  3. अंग्रेजों को शिकायत थी कि आवा दरबार में उनके रेजीडेन्टों के साथ दुव्र्यवहार किया गया था। इसलिए उन्होंने 1840 र्इ. के बाद रेजीडेण्ट नहीं भेजा। 
  4. वास्तविक कारण डलहाजै ी की साम्राजयवादी नीति थी। इंग्लैण्ड में भी नवीन प्रदेश को प्राप्त करने की माँग जोर पकड़ रही थी। 
  5. युद्ध का तात्कालिक कारण रंगून के दो अंग्रेज व्यापारियों शेपर्ड और लेविस का प्रकरण था। इस विषय में बर्मा के राजा को अल्टीमेटम दिया गया कि वह क्षमा याचना करे और एक लाख पॉण्ड क्षतिपूर्ति में दे। इन माँगों को उत्तर न आने पर डलहौजी ने युद्ध की घोशना कर दी।

युद्ध की घटनाएँ

इस युद्ध में अंग्रेज सेनापति गाडविन ने रंगून बसीन, प्रोम तथा पेगू पर अधिकार कर लिया। इससे बर्मा के संपूर्ण समुद्र तट पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया लेकिन डलहौजी ने राजधानी आवा की और बढ़ने का विचार त्याग दिया क्योंकि यह संकटों से पूर्ण था। उसने आवा नरेश से वार्ता का प्रयास किया। इसमें असफल होने पर उसने 20 दिसम्बर, 1852 के पेगू दक्षिणी बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी।

परिणाम

दक्षिणी बर्मा को एक नवीन प्रान्त बनाया गया जिसकी राजधानी रंगून बनायी गयी। बर्मा के समस्त समुद्र तट पर अंग्रजों का अधिकार हो जाने से उत्तरी बर्मा को समुद्र तट तक पहुँचने के लिए कोर्इ रास्ता नहीं रहा। दक्षिण बर्मा की विजय से अंतत: उत्तरी बर्मा को जीतने का भी मार्ग अंग्रेजों के लिए प्रशस्त हो गया।

समीक्षा

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध विशुद्ध रूप से साम्राज्यवादी युद्ध था। यह युद्ध केवल साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा से किया गया था। बर्मा के राजा ने युद्ध से बचने तथा अंग्रेजों को संतुष्ट करने का पूरा प्रयत्न किया लेकिन शक्ति के अहंक ार में अंग्रेज उद्दण्ड हो गये थे। भ्रष्ट व्यापारियों की शिकायतों को सुनना तथा आवा नरेश से क्षतिपूर्ति माँगना अनैतिक और अनुचित था। व्यापारी डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति से लाभ उठाना चाहते थे। लेम्बर्ट को भेजना भी युद्ध की योजना का एक अंग था डलहौजी की माँगें को कोर्इ अर्थ नहीं था क्योंकि उसने युद्ध का निर्णय पहले ही कर लिया था। यहां तक कि डलहौजी की नीति की इंग्लैण्ड में भी आलोचना की गयी।
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